यह अनुवाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से किया गया है। इसके अलावा, यह डॉ. मुस्तफा खत्ताब के "स्पष्ट कुरआन" पर आधारित है।

Surah 41 - فُصِّلَت

Fuṣṣilat (सूरह 41)

فُصِّلَت (Verses Perfectly Explained)

मक्की सूरहमक्की सूरह

परिचय

यह मक्की सूरह, जिसका नाम आयत 3 में कुरान के वर्णन से लिया गया है, मूर्तिपूजकों को सत्य से विमुख होने, कुरान का अपमान करने और अल्लाह का इनकार करने के लिए फटकार लगाती है, जो आकाशों और पृथ्वी का एकमात्र निर्माता है। इनकार करने वालों को चेतावनी दी जाती है कि क़यामत का दिन उनके अपने शारीरिक अंग उनके खिलाफ गवाही देंगे, जो उन्हें हमेशा के लिए जहन्नम में धकेल देगा। आद और समूद की अहंकारी, कृतघ्न कौमों के विनाश का उल्लेख किया गया है, क्योंकि मूर्तिपूजक अरब क्रमशः सीरिया और यमन की अपनी यात्राओं पर उनके खंडहरों के पास से गुज़रते थे। आयतों 30-36 में नेक लोगों का एक गहन वर्णन प्रस्तुत किया गया है। इस सूरह के अंत में और अगली सूरह की शुरुआत में कुरान की सच्चाई पर जोर दिया गया है। अल्लाह के नाम से जो परम कृपालु, अत्यंत दयावान है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है।

सत्य के इन्कार करने वाले

1. हा-मीम। 2. यह परम कृपालु, अत्यंत दयावान की ओर से अवतरण है। 3. यह एक ऐसी किताब है जिसकी आयतें सुस्पष्ट की गई हैं—एक अरबी क़ुरआन उन लोगों के लिए जो जानते हैं, 4. शुभ समाचार देने वाला और आगाह करने वाला। फिर भी उनमें से अधिकतर मुँह मोड़ लेते हैं, तो वे सुनते नहीं हैं। 5. वे कहते हैं, “जिसकी ओर तुम हमें बुला रहे हो, हमारे दिल उस पर परदे में हैं, और हमारे कानों में बहरापन है, और हमारे और तुम्हारे बीच एक रुकावट है। तो तुम अपना काम करो और हम अपना काम करेंगे!”

حمٓ
١
تَنزِيلٌ مِّنَ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ
٢
كِتَـٰبٌ فُصِّلَتْ ءَايَـٰتُهُۥ قُرْءَانًا عَرَبِيًّا لِّقَوْمٍ يَعْلَمُونَ
٣
بَشِيرًا وَنَذِيرًا فَأَعْرَضَ أَكْثَرُهُمْ فَهُمْ لَا يَسْمَعُونَ
٤
وَقَالُوا قُلُوبُنَا فِىٓ أَكِنَّةٍ مِّمَّا تَدْعُونَآ إِلَيْهِ وَفِىٓ ءَاذَانِنَا وَقْرٌ وَمِنۢ بَيْنِنَا وَبَيْنِكَ حِجَابٌ فَٱعْمَلْ إِنَّنَا عَـٰمِلُونَ
٥

सूरह 41 - فُصِّلَت (विस्तृत आयतें) - आयतें 1-5


इन्कार करने वालों को एक संदेश

6. कहो, (ऐ पैग़म्बर,) “मैं तो बस तुम्हारे जैसा एक इंसान हूँ, (लेकिन) मुझ पर यह वह्य की गई है कि तुम्हारा पूज्य केवल एक ही पूज्य है। तो उसकी ओर सीधा मार्ग अपनाओ और उससे माफ़ी माँगो। और धिक्कार है मुशरिकों पर!” 7. जो लोग ज़कात अदा नहीं करते और आख़िरत का इनकार करते हैं। 8. लेकिन जो लोग ईमान लाए और नेक अमल किए, उनके लिए यक़ीनन कभी न ख़त्म होने वाला अज्र होगा।

قُلْ إِنَّمَآ أَنَا۠ بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَـٰهُكُمْ إِلَـٰهٌ وَٰحِدٌ فَٱسْتَقِيمُوٓا إِلَيْهِ وَٱسْتَغْفِرُوهُ ۗ وَوَيْلٌ لِّلْمُشْرِكِينَ
٦
ٱلَّذِينَ لَا يُؤْتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَهُم بِٱلْـَٔاخِرَةِ هُمْ كَـٰفِرُونَ
٧
إِنَّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا وَعَمِلُوا ٱلصَّـٰلِحَـٰتِ لَهُمْ أَجْرٌ غَيْرُ مَمْنُونٍ
٨

सूरह 41 - فُصِّلَت (विस्तृत आयतें) - आयतें 6-8


इन्कार करने वालों से एक प्रश्न

9. कहो (ऐ पैग़म्बर), "तुम उसका कैसे इनकार करते हो जिसने ज़मीन को दो दिनों में पैदा किया? और तुम उसके साथ शरीक कैसे ठहराते हो? वही तो सारे जहानों का रब है।" 10. उसने धरती पर ऊँचे, दृढ़ पहाड़ रखे, उस पर बरकतें रखीं और उसमें उसके रिज़्क़ (आजीविका के साधन) निर्धारित किए—यह सब ठीक चार दिनों में—माँगने वालों के लिए। 11. फिर वह आकाश की ओर मुड़ा जब वह धुएँ जैसा था, और उससे तथा धरती से कहा, 'इच्छा से या अनिच्छा से, अधीन हो जाओ।' उन दोनों ने उत्तर दिया, 'हम इच्छा से अधीन होते हैं।' 12. तो उसने दो दिनों में आकाश को सात आसमानों में बनाया, प्रत्येक को उसका आदेश सौंपते हुए। और हमने सबसे निचले आसमान को (तारों जैसे) दीपकों से सजाया—सुंदरता के लिए और सुरक्षा के लिए। यह सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ का विधान है।

۞ قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَرْضَ فِى يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُۥٓ أَندَادًا ۚ ذَٰلِكَ رَبُّ ٱلْعَـٰلَمِينَ
٩
وَجَعَلَ فِيهَا رَوَٰسِىَ مِن فَوْقِهَا وَبَـٰرَكَ فِيهَا وَقَدَّرَ فِيهَآ أَقْوَٰتَهَا فِىٓ أَرْبَعَةِ أَيَّامٍ سَوَآءً لِّلسَّآئِلِينَ
١٠
ثُمَّ ٱسْتَوَىٰٓ إِلَى ٱلسَّمَآءِ وَهِىَ دُخَانٌ فَقَالَ لَهَا وَلِلْأَرْضِ ٱئْتِيَا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا قَالَتَآ أَتَيْنَا طَآئِعِينَ
١١
فَقَضَىٰهُنَّ سَبْعَ سَمَـٰوَاتٍ فِى يَوْمَيْنِ وَأَوْحَىٰ فِى كُلِّ سَمَآءٍ أَمْرَهَا ۚ وَزَيَّنَّا ٱلسَّمَآءَ ٱلدُّنْيَا بِمَصَـٰبِيحَ وَحِفْظًا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
١٢

सूरह 41 - فُصِّلَت (विस्तृत आयतें) - आयतें 9-12


आद और समूद का अंजाम

13. यदि वे मुँह मोड़ें, तो कहो, (हे पैगंबर,) "मैं तुम्हें एक (भयंकर) गर्जना से डराता हूँ, जैसी कि आद और समूद पर आई थी।" 14. उनके पास रसूल हर ओर से आए थे, (यह घोषणा करते हुए,) "अल्लाह के सिवा किसी की इबादत न करो।" उन्होंने जवाब दिया, "यदि हमारे रब ने चाहा होता, तो वह आसानी से फ़रिश्ते भेज सकता था (इसके बजाय)। अतः हम पूरी तरह से अस्वीकार करते हैं जो कुछ तुम्हें देकर भेजा गया है।" 15. जहाँ तक आद का संबंध है, उन्होंने ज़मीन में बिना किसी हक़ के घमंड किया, यह डींग मारते हुए, "शक्ति में हमसे बढ़कर कौन है?" क्या उन्होंने नहीं देखा कि अल्लाह (स्वयं), जिसने उन्हें पैदा किया, शक्ति में उनसे कहीं बढ़कर था? फिर भी वे हमारी निशानियों को झुठलाने पर अड़े रहे। 16. तो हमने उन पर एक प्रचंड हवा भेजी, कई मनहूस दिनों तक, ताकि हम उन्हें इस दुनियावी ज़िंदगी में एक अपमानजनक अज़ाब चखाएँ। और आख़िरत का अज़ाब तो कहीं ज़्यादा ज़िल्लत भरा होगा। और उनकी मदद नहीं की जाएगी। 17. और जहाँ तक समूद का संबंध है, हमने उन्हें हिदायत दिखाई, लेकिन उन्होंने हिदायत के मुक़ाबले में अंधत्व को पसंद किया। तो उन्हें एक अपमानजनक अज़ाब की कड़क ने आ घेरा उनके उन कर्मों के कारण जो वे करते थे। 18. और हमने उन लोगों को बचा लिया जो ईमान लाए थे और परहेज़गार थे।

فَإِنْ أَعْرَضُوا فَقُلْ أَنذَرْتُكُمْ صَـٰعِقَةً مِّثْلَ صَـٰعِقَةِ عَادٍ وَثَمُودَ
١٣
إِذْ جَآءَتْهُمُ ٱلرُّسُلُ مِنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا تَعْبُدُوٓا إِلَّا ٱللَّهَ ۖ قَالُوا لَوْ شَآءَ رَبُّنَا لَأَنزَلَ مَلَـٰٓئِكَةً فَإِنَّا بِمَآ أُرْسِلْتُم بِهِۦ كَـٰفِرُونَ
١٤
فَأَمَّا عَادٌ فَٱسْتَكْبَرُوا فِى ٱلْأَرْضِ بِغَيْرِ ٱلْحَقِّ وَقَالُوا مَنْ أَشَدُّ مِنَّا قُوَّةً ۖ أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ ٱللَّهَ ٱلَّذِى خَلَقَهُمْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةً ۖ وَكَانُوا بِـَٔايَـٰتِنَا يَجْحَدُونَ
١٥
فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًا صَرْصَرًا فِىٓ أَيَّامٍ نَّحِسَاتٍ لِّنُذِيقَهُمْ عَذَابَ ٱلْخِزْىِ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ ٱلْـَٔاخِرَةِ أَخْزَىٰ ۖ وَهُمْ لَا يُنصَرُونَ
١٦
وَأَمَّا ثَمُودُ فَهَدَيْنَـٰهُمْ فَٱسْتَحَبُّوا ٱلْعَمَىٰ عَلَى ٱلْهُدَىٰ فَأَخَذَتْهُمْ صَـٰعِقَةُ ٱلْعَذَابِ ٱلْهُونِ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
١٧
وَنَجَّيْنَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ
١٨

सूरह 41 - فُصِّلَت (विस्तृत आयतें) - आयतें 13-18


Fuṣṣilat () - अध्याय 41 - स्पष्ट कुरान डॉ. मुस्तफा खत्ताब द्वारा