यह अनुवाद कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से किया गया है। इसके अलावा, यह डॉ. मुस्तफा खत्ताब के "स्पष्ट कुरआन" पर आधारित है।

Surah 28 - القَصَص

Al-Qaṣaṣ (सूरह 28)

القَصَص (The Whole Story)

मक्की सूरहमक्की सूरह

परिचय

आयत 26:18-19 में, फिरौन मूसा (ﷺ) को याद दिलाता है कि उसका पालन-पोषण फिरौन की देखरेख में हुआ था और कैसे मूसा (ﷺ) ने (अनजाने में) एक मिस्री को मार डाला था। पिछली सूरह के विपरीत, यह मक्की सूरह मूसा के मिस्र में जीवन के इन दो पहलुओं पर केंद्रित है, साथ ही मिद्यान भागने पर भी, जहाँ वह अपनी भावी पत्नी से मिले थे। एक और पहलू मूसा के लोगों में से एक, क़ारून की कहानी है, जिसने घमंड से व्यवहार किया, जिसके कारण उसका अपना विनाश हुआ। पिछली सूरह की तरह ही, यह अल्लाह की शक्ति और क़ुरआन की प्रामाणिकता की पुष्टि करती है। एक बार फिर, पैगंबर (ﷺ) को याद दिलाया जाता है कि उनका कर्तव्य परिवर्तित करना नहीं, बल्कि संदेश पहुँचाना है। बहुदेववादियों की आलोचना करने के बाद (आयत 45-75), यह सूरह पैगंबर (ﷺ) को दृढ़ रहने का आदेश देकर समाप्त होती है। अगली सूरह दृढ़ता के बारे में बात करके शुरू होती है। अल्लाह के नाम से जो अत्यंत कृपाशील, दयावान है।

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَـٰنِ ٱلرَّحِيمِ

अल्लाह के नाम से, जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहम वाला है।

फ़िरऔन का अत्याचार

1. टा-सीन-मीम। 2. ये स्पष्ट किताब की आयतें हैं। 3. हम आपको (ऐ नबी) मूसा और फ़िरऔन का कुछ वृत्तांत सच्चाई के साथ सुनाते हैं, उन लोगों के लिए जो ईमान रखते हैं। 4. निश्चय ही फ़िरौन ने ज़मीन में सरकशी की और वहाँ के लोगों को कई गिरोहों में बाँट दिया, उनमें से एक गिरोह को वह दबाता था, उनके बेटों को क़त्ल करता था और उनकी औरतों को ज़िंदा रखता था। वह यक़ीनन फ़साद फैलाने वालों में से था। 5. और हमारा इरादा था कि हम उन लोगों पर एहसान करें जिन्हें ज़मीन में कमज़ोर कर दिया गया था, और उन्हें पेशवा बनाएँ और उन्हें वारिस बनाएँ। 6. और उन्हें ज़मीन में क़ायम करें; और उनके ज़रिए फ़िरौन, हामान और उनके लश्कर को वही दिखाएँ जिसका उन्हें डर था।

طسٓمٓ
١
تِلْكَ ءَايَـٰتُ ٱلْكِتَـٰبِ ٱلْمُبِينِ
٢
نَتْلُوا عَلَيْكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِٱلْحَقِّ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
٣
إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِى ٱلْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًا يَسْتَضْعِفُ طَآئِفَةً مِّنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَآءَهُمْ وَيَسْتَحْىِۦ نِسَآءَهُمْ ۚ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلْمُفْسِدِينَ
٤
وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى ٱلَّذِينَ ٱسْتُضْعِفُوا فِى ٱلْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ ٱلْوَٰرِثِينَ
٥
وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَنُرِىَ فِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُم مَّا كَانُوا يَحْذَرُونَ
٦

सूरह 28 - القَصَص (कहानी) - आयतें 1-6


नील नदी में शिशु मूसा

7. हमने मूसा की माँ को वह्य की: "उसे दूध पिलाओ, लेकिन जब तुम्हें उसके बारे में डर लगे, तो उसे दरिया में डाल देना, और न डरो और न ग़म करो। हम उसे यक़ीनन तुम्हें वापस लौटा देंगे, और उसे रसूलों में से एक बना देंगे।" 8. और फ़िरऔन के लोगों ने उसे उठा लिया, ताकि वह उनके लिए दुश्मन और ग़म का सबब बने। यक़ीनन फ़िरऔन, हामान और उनके सिपाही गुनाहगार थे।

وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰٓ أُمِّ مُوسَىٰٓ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِى ٱلْيَمِّ وَلَا تَخَافِى وَلَا تَحْزَنِىٓ ۖ إِنَّا رَآدُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
٧
فَٱلْتَقَطَهُۥٓ ءَالُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَـٰمَـٰنَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا خَـٰطِـِٔينَ
٨

सूरह 28 - القَصَص (कहानी) - आयतें 7-8


महल में मूसा

9. फ़िरऔन की पत्नी ने (उससे) कहा, "(यह बच्चा) मेरे और तुम्हारे लिए आँखों की ठंडक है। उसे क़त्ल मत करो। शायद वह हमारे काम आए या हम उसे अपना बेटा बना लें।" वे बेख़बर थे। 10. और मूसा की माँ का दिल इतना बेचैन हो गया कि वह लगभग उसकी पहचान प्रकट कर देती, यदि हमने उसके दिल को मज़बूत न किया होता ताकि वह ईमान लाए। 11. और उसने उसकी बहन से कहा, "उस पर नज़र रखो!" तो वह दूर से उस पर नज़र रखती रही, जबकि वे बेख़बर थे। 12. और हमने पहले ही उस पर सभी दूध पिलाने वाली स्त्रियों को हराम कर दिया था, तो उसकी बहन ने कहा, "क्या मैं तुम्हें एक ऐसे परिवार का पता बताऊँ जो उसे तुम्हारे लिए पालेगा और उसकी अच्छी देखभाल करेगा?" 13. इसी तरह हमने उसे उसकी माँ के पास लौटा दिया ताकि उसकी आँखें ठंडी हों और वह ग़मगीन न हो, और ताकि वह जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा है। लेकिन ज़्यादातर लोग नहीं जानते। 14. और जब वह अपनी पूरी शक्ति और परिपक्वता को पहुँच गया, तो हमने उसे हिकमत और इल्म दिया। इसी तरह हम नेक काम करने वालों को बदला देते हैं।

وَقَالَتِ ٱمْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍ لِّى وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰٓ أَن يَنفَعَنَآ أَوْ نَتَّخِذَهُۥ وَلَدًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
٩
وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَـٰرِغًا ۖ إِن كَادَتْ لَتُبْدِى بِهِۦ لَوْلَآ أَن رَّبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
١٠
وَقَالَتْ لِأُخْتِهِۦ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِۦ عَن جُنُبٍ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
١١
۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ ٱلْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰٓ أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُۥ لَكُمْ وَهُمْ لَهُۥ نَـٰصِحُونَ
١٢
فَرَدَدْنَـٰهُ إِلَىٰٓ أُمِّهِۦ كَىْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ ٱللَّهِ حَقٌّ وَلَـٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
١٣
وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُۥ وَٱسْتَوَىٰٓ ءَاتَيْنَـٰهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِى ٱلْمُحْسِنِينَ
١٤

सूरह 28 - القَصَص (कहानी) - आयतें 9-14


अनजाने में हत्या

15. (एक दिन) वह शहर में दाख़िल हुआ जबकि उसके लोग बेख़बर थे। वहाँ उसने दो आदमियों को लड़ते हुए पाया: एक उसकी अपनी क़ौम का था और दूसरा उसके दुश्मनों में से। उसकी क़ौम के आदमी ने अपने दुश्मन के ख़िलाफ़ उससे मदद माँगी। तो मूसा ने उसे मुक्का मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। मूसा ने कहा, “यह शैतान का काम है। वह यक़ीनन एक खुला, गुमराह करने वाला दुश्मन है।” 16. उसने दुआ की, “ऐ मेरे रब! मैंने यकीनन अपनी जान पर ज़ुल्म किया है, तो मुझे माफ़ कर दे।” तो उसने उसे माफ़ कर दिया, बेशक वही बड़ा बख्शने वाला, निहायत रहम करने वाला है। 17. मूसा ने अहद किया, “ऐ मेरे रब! तेरी उन तमाम नेमतों के बदले जो तूने मुझ पर की हैं, मैं कभी भी मुजरिमों का साथ नहीं दूँगा।”

وَدَخَلَ ٱلْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَـٰذَا مِن شِيعَتِهِۦ وَهَـٰذَا مِنْ عَدُوِّهِۦ ۖ فَٱسْتَغَـٰثَهُ ٱلَّذِى مِن شِيعَتِهِۦ عَلَى ٱلَّذِى مِنْ عَدُوِّهِۦ فَوَكَزَهُۥ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَـٰذَا مِنْ عَمَلِ ٱلشَّيْطَـٰنِ ۖ إِنَّهُۥ عَدُوٌّ مُّضِلٌّ مُّبِينٌ
١٥
قَالَ رَبِّ إِنِّى ظَلَمْتُ نَفْسِى فَٱغْفِرْ لِى فَغَفَرَ لَهُۥٓ ۚ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلْغَفُورُ ٱلرَّحِيمُ
١٦
قَالَ رَبِّ بِمَآ أَنْعَمْتَ عَلَىَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًا لِّلْمُجْرِمِينَ
١٧

सूरह 28 - القَصَص (कहानी) - आयतें 15-17


Al-Qaṣaṣ () - अध्याय 28 - स्पष्ट कुरान डॉ. मुस्तफा खत्ताब द्वारा